प्रशांत किशोर ने शराबबंदी के आर्थिक और प्रशासनिक खोखलेपन को उजागर करते हुए तंत्र पर गंभीर आरोप लगाए. राज्य सरकार को हर साल लगभग 30 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है. जो पैसा बिहार के विकास में लगना था, वह अब सीधे शराब माफियाओं और भ्रष्ट नेताओं की जेब में जा रहा है.
शराबबंदी सिर्फ कागजों तक सीमित है. हकीकत में, अन्य राज्यों से धड़ल्ले से तस्करी हो रही है और बिहार के हर गांव-कस्बे में शराब आसानी से बिक रही है. भ्रष्ट तंत्र जानबूझकर इसे जारी रखना चाहता है ताकि उनकी अवैध कमाई न रुके.
पीके ने शराबबंदी के सामाजिक दुष्प्रभावों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे राज्य की युवा पीढ़ी बर्बादी की कगार पर है. शराबबंदी के बाद बिहार के गांवों में एक नया और खतरनाक ट्रेंड शुरू हुआ है. शराब न मिलने या महंगी होने के कारण युवा अब गांजा, स्मैक जैसे 'सूखे नशे' (Dry Drugs) का शिकार हो रहे हैं, जो पहले बिहार की सच्चाई नहीं थी.
हाल ही में जहरीली शराब से हुई 5 लोगों की मौत का जिक्र करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि छपरा में एक साथ 70-80 लोग मारे गए थे. 2016 के बाद से अब तक 5,000 से अधिक लोग जहरीली शराब का शिकार हो चुके हैं, लेकिन सरकार अपनी जिद पर अड़ी है.
प्रशांत किशोर ने स्पष्ट किया कि इस कानून से समाज का कोई भला नहीं हुआ है, बल्कि इसने भ्रष्टाचार और मौतों का एक नया नेक्सस तैयार कर दिया है, जिसे तुरंत रोका जाना चाहिए.